अन्तस की यात्रा

Dedication : This blog is dedicated tothose great spirits(Sants), who following the tradition of Guru Shishya, deemed me worthy of attention and introduced me to PRAN DHYAN, the method of simplest and highest form of meditation. Where direct and indirect blessings are always with me, by the path shown by the them. With the effect that I guide and sport those who arementally disturbed in some forms and are in search of peace. In life through positive thinking and meditation I have come back to my self. If you like tocome, you’re. Note: I only show you the way, you only have to walk. You will only receive sensations. Come to thy self increase your self power. click here for English version


समर्पण
यह ब्लॉग उन महान आत्माओं (संतों) को समर्पित है जिन्होंने गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत मुझे इस योग्य समझा और प्राण ध्यान की विधि से मेरा परिचय कराया जोकि ध्यान की सबसे सरलतम एवं उच्चतम विधि है। उन महान संतों को, जिनका परोक्ष / अपरोक्ष आशीर्वाद सदैव मेरे सिर पर रहता है। इस आशय के साथ कि उनके द्वारा दिखाए मार्ग द्वारा मै उन लोगों का सहयोग करूँ जो किसी न किसी रूप में मानसिक रूप से परेशान हैं। जिन्हें शांति की तलाश है. सकारात्मक सोच और प्राण ध्यान के माध्यम से मै अपने पास वापस आ गया हूँ। यदि आप भी आना चाहें तो आपका स्वागत है। ध्यान रहे ! मै केवल आपको मार्ग दिखाऊँगा, चलना आप ही को पड़ेगा। अनुभूतियाँ आप ही को प्राप्त होंगी। अपने खुद के पास आइए, अपनी ऊर्जाशक्ति को बढ़ाईए।
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Wednesday, 11 January 2012

क्या बचपन इसी को कहते है ?




एक बार मै अपने टूर पर था। मै बलरामपुर से झालीधाम की ओर जा रहा था। रास्ते में एक छोटा सा कस्बा पड़ता है जिसका नाम ईंटियाठोक है। मेरे साथ रामू दादा भी थे। पत्ते भैया कार चला रहे थे। रास्ते मै एक स्थान पर सड़क निर्माण का कार्य चल रहा था। अचानक मेरी दृष्टि दो मासूम बच्चों पर पड़ी। उन्हें देख कर मेरा मन धक्क से रह गया। मैंने तुरंत कार रुकवाई। उन बच्चों का चित्र लिया। मेरा मन धक्क से क्यों रह गया ? इस चित्र को देखकर आप स्वएं सहज ही अनुमान लगा सकते हें। मै रास्ते भर यही सोचता रहा कि क्या बचपन इसी को कहते है ?
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Tuesday, 10 January 2012

साकारात्मक सोच का एक और पाठ

बलरामपुर में मेरे आत्मीय जनों में से एक उमा शंकर श्रीवास्तव रहते थे। मूलत: वह फैजाबाद के रहने वाले थे। सिंचार्इ विभाग में अधिकारी थे। कविताएं लिखने का उन्हें बहुत शौक था। अंकल उनका तखल्लुस होने के कारण छोटे बड़े सभी उन्हें अंकल कह कर ही पुकारते थे। एक बार मुझे डा0 राना के पास जाना था। जल्दी पहुंचने के चक्कर में मैं अंकल के साथ बस स्टेशन से छोटे मार्ग की गलियों से होकर गुजर रहा था। थोड़ी ही दूरी पर एक साँड़ आता दिखार्इ दिया। मैंने उन्हें कहीं रुक जाने को कहा, ताकि साँड़ चला जाए। वास्तव में मैं साँड से बहुत डरता था। अंकल बोले- डरो मत, साँड़ के प्रति साकारात्मक सोच बना कर उसकी तारीफ करते हुए उसके बगल से गुजरे वह कुछ नहीं कहेगा। मैने उनसे मज़ाक में कहा- अंकल जी! वह कहेगा तो कुछ नहीं, बलिक कुछ करेगा (मारेगा) जरूर। अंकल रुके नहीं। मैं उनके पीछे-पीछे, डरा-सहमा, लेकिन उनकी आज्ञा का पालन करते हुए मन ही मन साँड़ की तारीफ करते हुए चलने लगा। साँड़ हमारे बगल से होकर गुजर गया। तब अंकल बोले- देखा यह होती है, साकारात्मक सोच।
कुछ ही दिनों बाद एक दिन अंकल के घर के सामने कुछ भीड़ दिखार्इ दी। वही साँड़ अंकल के पेट को अपने दोनों सींगों के बीच में फंसा कर उन्हें उनके गेट के साथ सटाए खड़ा था। अंकल उसे सहला रहे थे। भीड़ में से किसी ने डंडा लेकर आने और साँड़ को भगाने की बात की, तो अंकल ने मना कर दिया। कुछ मिनट बाद साँड़ बिना उन्हें कुछ नुकसान पहुंचाए चला गया। मैने उनसे पूछा कि- आप डरे नहीं। वे बड़े सहज भाव से बोले- उस दिन उसकी तारीफ की थी न, उसी का धन्यवाद करने आया था वह। मै सोच रहा था कि यदि उनके स्थान पर मैं होता तो निश्चित बेहोश हो गया होता। साकारात्मक सोच का एक और पाठ तो मैने सीख ही लिया था।

प्रसन्नता का अनुभव

बलरामपुर नगर में मुख्य मार्ग पर जो चौराहा है, उसे वीर विनय चौक के नाम से जाना जाता है। सन 2000 र्इ0 की बात है। बलरामपुर नया जिला बना था। मैं उस पर एक किताब 'सार संकलन बलरामपुर लिख रहा था। इस पुस्तक का व्यय भार बलरामपुर चीनी मिल के तत्कालीन ग्रुप जनरल मैनेजर र्इश्वर दयाल मित्तल द्वारा किया जा रहा था। उसी दौरान मैने काफी प्रयास करके वीर विनय की संक्षिप्त जीवनी एकत्र की थी। वह एक फौजी था। छोटी सी आयु में वह भारत पाक युद्ध में शहीद हुआ था। उसकी संक्षिप्त जीवनी चित्र सहित मैने बलरामपुर वाली किताब में प्रकाशित भी की थी। मैने ही श्री मित्तल जी को वीर विनय कायस्था की मूर्ति बनवा कर लगवाने हेतु प्रेरित किया। वह उसका व्यय भार उठाने को तैयार हो गये। मुझे लखनऊ भेज कर उन्होंने उसका अनुमानित व्यय बताने को कहा। मैने सारी जानकारियाँ एकत्र करने के बाद फार्इल मित्तल साहब को सौंप दी। यह पहला अवसर था कि जब लोगों ने उस किताब के माध्यम से विनय कायस्थ को चित्र से पहचाना था। उसी दौरान मित्तल साहब नौकरी छोड़कर अन्यत्र चले गए। वह फाइल और मेरी सोच, मेरा स्वप्न सब अधूरा रह गया।
इसके ठीक दस साल बाद मुझे पता चला कि नगर के एक सभ्रांन्त व्यक्ति जिसे लोग आजाद सिंह अथवा छोटे भैया के नाम से जानते हैं। उन्होने चीनी मिल के माध्यम से मेरे उस सपने अथवा मेरे उस अधूरे कार्य को पूरा करने का बीड़ा उठाया। यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुर्इ। वीर विनय की मूर्ति स्थापित करने की परियोजना हेतु आजाद सिंह की अध्यक्षता में कमेटी का गठन हुआ। पथिक होटल में बैठकों का आयोजन होता रहता। जिले के गाँव-गाँव से सहयोग प्राप्त करने पर बल दिया जाने लगा। धीरे-धीरे कार्य रेंगने लगा और एक दिन मूर्ति स्थापित भी हो गर्इ। मूर्ति स्थापना के प्रारम्भ से लेकर उसकी स्थापना के समय तक] मेरा जब भी कभी अचानक आजाद सिंह से आमना सामना होता, वे मेरी बड़ी तारीफ करते, चाय पिलाते] पास बैठाते। यह अलग बात है कि उस परियोजना के प्रारम्भ से अन्त तक उन्होंने अपनी सोच और अपनी बैठकों से मुझे बहुत दूर रखा। लेकिन सत्यता यह है कि जब भी कभी उस वीर पुरुष का जिक्र आता है, मेरा सिर आजाद सिंह के लिए नतमस्तक हो जाता है। मैं उन्हें पहले से कहीं अधिक सम्मान देता हूँ, अपने भीतर उनके प्रति आदर की भावना रखता हूँ, क्योंकि उन्होंने मेरे अधूरे कार्य को पूर्ण किया है। इस बात की प्रसन्नता का अनुभव शायद मेरे सिवा अन्य किसी को न  होता।

याद किया और घंटी बजी 4

लखनऊ में दत्ता साहब का परिवार रहता है। लगभग पचीस साल से अधिक पुराना उनसे सम्बन्ध है। यह अलग बात है कि जिसके माध्यम से मेरा उनसे संबंध स्थापित हुआ था उसे दुनिया से गए लगभग बारह वर्ष होने को हैं। लेकिन उस परिवार से  मेरा लगाव ज्यों का त्यों है। जैसे कि प्रत्येक व्यकित के जीवन में कभी न कभी कुछ दिन संघर्ष भरे अवश्य होते हैं। उसी प्रकार मेरे जीवन में जब संघषोर्ं के बादल छाए, तब दत्ता परिवार एक छाते के भांति मेरे साथ रहा। उनका वह अदृश्य छाता मैं अपने अन्तस में सदैव अपने साथ पाता हूँ। उनके घर के प्रत्येक सदस्य के लिए मैंने एक साकारात्मक सोच बना रखी है कि उन सबके विचार मेरे प्रति कैसे हैं, मुझे इससे कोर्इ मतलब नहीं। हाँ! इतना अवश्य चाहता हूँ कि जब उन्हें छोटी बड़ी किसी समस्या जैसे बादल दिखार्इ दें तो उस समय छाता मेरा ही हो। मैं पिछले कुछ दिनों से महसूस कर रहा था कि श्रीमती दत्ता मानसिक रूप से बहुत परेशान हैं। मैं उनकी मानसिक शानित के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता हूँ। एक दिन रात के ग्यारह बजे से कुछ अधिक समय रहा होगा। मुझे बार बार श्रीमती दत्ता का ध्यान आ रहा था, लगता था जैसे कुछ परेशानी में हैं। इसी सोच में डूबा था कि मेरे मोबाइल फोन की घंटी बजी। उधर से श्रीमती दत्ता फोन पर थीं। मेरे हेलौ कहते ही उधर से सिसकियों की आवाज सुनार्इ दी। उसके बाद का लिखना आवश्यक नहीं बस इतना ही काफी है कि मेरे छाते की अब उन्हें तीव्र आवश्यक्ता थी। ऐसे न जाने कितने अनुभव हैं। सब लिखने लगूँ तो एक अलग पुस्तक ही इस तैयार हो जाएगी।

याद किया और घंटी बजी


कुछ महीने पहले की बात है। मैं हिमाचल गिरिपार का हाटी समुदाय विषय पर पुस्तक लिख रहा था। लिखते लिखते किसी विषय पर मुझे पांवटा निवासी श्री राजेन्द्र तिवारी जी की सहायता की आवश्यक्ता पड़ी। मैंने उन्हें फोन मिलाया। कर्इ बार मिलाने पर भी उधर से सिवच आफ होने की सूचना मिल रही थी। तीन दिन बीत गए पर फोन नहीं मिला। चौथे दिन फिर उसी विषय पर मुझे उनकी जरूरत का अहसास हुआ। मैंने यह सोच कर फोन उठाया कि यदि अब उनसे बात न हो पार्इ तो इस विषय को ही पुस्तक से निकाल दूंगा। मोबाइल सेट हाथ में लेकर जैसे ही तिवारी जी का नम्बर डायल करने लगता हूँ कि नम्बर मिलाने से पूर्व मोबाइल की घंटी बज उठी। देखा तो तिवारी जा का फोन आ रहा था। इस सन्दर्भ में बलरामपुर निवासी रामू दादा की चर्चा करनी आवश्यक है। हमारे बीच अक्सर यह होता था कि जब कभी मोबाइल सेट हाथ में लेकर जैसे ही वह मेरा नम्बर मिलाने लगते तो मैं उनके दरवाजे पर होता। तब वे मिलाया गया नम्बर दिखाते कि देखो तुमको ही मिला रहा था। कर्इ बार मैं उनका नम्बर मिलाने लगता तो देखता कि वह मेरे दरवाजे पर होते। उस समय हैरानी पूर्वक मैं उन्हें अपने द्वारा मिलाया गया नम्बर दिखाता और कहता- देखिए, मैं आपका नम्बर ही मिला रहा था।

सोच विचार की तरंगें 3


लखनऊ में मेरे एक परिचित है जिनका नाम है हर्ष। उनकी पत्नी का नाम है पूजा। एक बार मेरा लखनऊ में प्रवास था। मै पूर्वा नामक एक महिला की  जन्मपत्री का अध्ययन कर रहा था। रात के दस बजने को थे। मैं पूरे मन से उसकी जन्मपत्री के अध्ययन में डूबा हुआ था। पूर्वा नाम याद आते ही सहसा मुझे पूजा का ध्यान आ गया। कुछ क्षणों के लिए मेरी सोच की ओर घूम गर्इ। पूजा की जन्मपत्री के आधार पत्र मैंने उसे बताया कि इस समय सीमा के भीतर उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा, ध्यान रखना। काफी समय से उनके घर नहीं गया था। ना ही उनसे फोन वार्ता हो पार्इ थी। किसी दिन समय मिलेगा तो उनके घर हो आऊंगा। इस विचार से मैंने अपने सिर को झटक कर पुन: पूर्वा की जन्मपत्री पर ध्यान देने का प्रयास किया। तभी मेरे मोबाइल फोन की घंटी बजी तो देखा हर्श का नम्बर था। उधर से पूजा की आवाज सुनार्इ दी-आप कहाँ हैं ? मैने कहा कि लखनऊ, सिंह साहब की कोठी में। खैरियत तो है; पूजा ने कहा- हम लोग हनुमान सेतु मनिदर से लौट रहे हैं। आपका ध्यान आया। यदि आप जाग रहे हों तो हम आपसे मिलते हुए घर चले जाएंगे। मैंने उन्हें बुलवा लिया। कुछ देर बैठने के बाद जब वो जाने लगे तो मैंने उन दोनों से कहा- जिस सोच या भावना से डूब कर आप लोग आएं हैं, उसी भावना में डूब कर वापस जाइयेगा, ताकि मेरे कमरें में बिखरे अस्त व्यस्त सामान की ओर आपका ध्यान न रहे। वास्तव में कमरे के अस्त-व्यस्त बिखरे सामान की कुछ शर्मिन्दगी भी थी। लेकिन यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि पूर्वा से पूजा पर सोच या विचार का जाना और तत्काल उस तक पहुंचना। यह भी सोच विचार की तरंगों का एक पाठ था।

सोच की भाषा 2

बलरामपुर में सत्यम स्टूडियो के नाम से एक दूकान है जहाँ शादी विवाह आदि की वीडियो फिल्म की मिकिसंग का काम होता था। चार पाँच कम्प्यूटर पर चार पाँच लड़के काम किया करते थे। उनमें एक लड़की भी थी। काफी बाद में पता चला कि उसका नाम रुचि पाण्डेय था। स्टूडियो का मालिक शिवनाथ मेरा परिचित था। एक बार मैं उसके स्टूडियो में बैठा था। सभी अपने अपने अपने काम में व्यस्त थे। मै और शिवनाथ चाय पीते हुए बातें भी कर रहे थे। उस लड़की की पीठ मेरी ओर थी अत: मैं उसका चेहरा नहीं देख सकता था। हाँ उसके द्वारा किया जा रहा काम, जो कि कासिटंग में दिए जाने वाले नाम थे, उसे टाइप कर रही थी और वह मुझे मानीटर पर स्पष्ट दिख रहे थे। अचानक वह उठी बाहर गर्इ और दो तीन मिनट बाद लौट कर पुन: अपने कार्य में व्यस्त हो गर्इ। तब मैने उसका चेहरा देखा था। वह बाइस से चौबीस वर्षीय खूबसूरत गौरवर्णीय युवती थी। उसको देखने के बाद सहसा मेरे दिमाग में एक प्रश्न उत्पन्न हो गया। मै सोच रहा था कि यह लड़की यदि यहाँ कम्प्यूटर सीख रही है तो अपना समय बर्बाद कर रही है। क्योंकि जो वह सीख रही वह उसे कभी नहीं सीख सकेगी। उसका मानसिक स्तर उसके द्वारा टाइप किए जाने वाले काम से अनुमानित किया जा सकता है। फिर यदि वह सीख भी गर्इ तो उसके किसी काम का नहीं। क्योंकि बलरामपुर में वीडियो मिकिसंग का कोर्इ भविष्य नहीं है। कहीं बाहर जाकर काम करना भी इसके वश के बाहर होगा क्योंकि इस क्षेत्र के लोग लड़कियों को नौकरी तो क्या उच्च शिक्षा हेतु भी बाहर भेजना पसन्द नहीं करते। कुछ ही पलों में अपनी इस सोच से बाहर आ गया कि मैंने इससे क्या लेना देना है। इसे समझाने का या कुछ कहना न तो मेरे अधिकार क्षेत्र में है, और न उचित ही है। हा,ँ कभी मुझसे राय ली तो समझा दूंगा। कुछ देर बाद मैं घर चला आया। इसके पाँच छ: दिन बाद एक दिन दरवाजे पर आहट हुर्इ। दरवाजा खोलते ही आगन्तुक को देख कर मैं आश्चर्य चकित रह गया। मेरे सामने वही कम्प्यूटर वाली लड़की खड़ी थी। उस युवती को बैठा कर मैने पड़ोसी की लड़की प्रिन्सी को आवाज दी जो कभी कभी मेरी चाय बना दिया करती थी। प्रिन्सी ने उसके लिए चाय पानी का प्रबन्ध किया।
उसी समय लखनऊ से मेरे मित्र राजा डी0 पी0 सिंह आ गए। उस युवती का परिचय कराते हुए मैने उनसे इतना ही कहा इनसे मेरी प्रथम भेंट है, और मैं इनका नाम भी नहीं जानता और इनके यहाँ आने का प्रयोजन से भी मैं अनभिज्ञ हूँ। अच्छा यही है कि हमारी वार्तालाप में आप भी शरीक हो जांए ताकि आपको बोरियत न हो। उस युवती ने राजा साहब को अपना नाम बताया तो मुझे उसका नाम पता चला। उसने राजा साहब को जो कुछ बताया उसका सारांश यह था कि उसने मुझे पहली बार उस स्टूडियो में देखा था। मेरी और शिवनाथ की बातों को बड़े ध्यान से सुन रही थी। रात को जब वह सोने चली तो उसे मेरा ध्यान आया और उसी के साथ एक सोच उभर कर आती कि यही मुझे सही दिशा प्रदान करेंगे। यह सिलसिला उस दिन से लगातार चल रहा था कि मैं बख्शी सर का पता पूछते-पूछते आज यहाँ तक पहुंच गर्इ हूँ। मैंने राजा साहब को समय देना था इसलिए मैने उसे अगले दिन आने को कहा और उसे विदा करना चाहा। जब वह जाने लगी तो राजा साहब ने उसे रोककर कहा- जहां तक मेरा मानना है तुम सही जगह आर्इ हो। तुम्हें सही सलाह मिलेगी। मैं इन्सानों के भीतर छिपी प्रतिभा को परखने में कभी चूक नहीं करता। यहाँ, इनके आया हूँ, तो कुछ सोच कर। कल से तुम एक नर्इ जिन्दगी शुरू करोगी।
रुचि चली गर्इ। अगले दिन वह आर्इ तो उसने वही सब बताया जो उस दिन स्टूडियो मैं बैठा सोच रहा था। वह बी00 पास थी। आगे की पढ़ार्इ बन्द थी। माँ बाप कहीं बाहर भेजने को तैयार न थे। उनसे विद्रोह करके मैंने कम्प्यूटर सीखना चाहा। यहां जो सिखाया जा रहा है वह मेरी समझ में नहीं आता। मैने उसे समझाया कि अगर कम्प्यूटर सीखना चाहो तो बलरामपुर में ये-ये लोग विधिवत सिखाते हैं। जाकर उचित कोर्स करो। अच्छा यही है कि एम00 और बी0एड0 की पढ़ार्इ करो और शिक्षक बन जाओ, जो तुम्हारे लिए सरल और उचित भी है। यह मेरा फोन नम्बर है जब भी जरूरत पड़े सलाह ले लेना। जब तक मेरा बलरामपुर प्रवास रहा वह यदा कदा आती रही। उसे मैने प्राण ध्यान सिखाने हेतु शिष्य भी बनाया। बाद में फोन द्वारा वह मुझसे दिशा निर्देश लेती रही। अभी तक कुछ दिन पहले उसके फोन द्वारा पता चला कि उसने एम00 कर लिया है और बलरामपुर के किसी स्कूल में शिक्षिका के पद पर कार्यरत है। इन दिनों भी कभी-कभी मेरे मोबाइल सेट में उसकी मिस काल दिखार्इ दे जाती है। लेकिन मै उसका फोन अब उठाता नहीं, इधर से कभी मिलाता नहीं। जानता हूँ, उसका पहला वाक्य यही सुनार्इ देगा-सर आप बलरामपुर कब आंएगे। दूसरा यह भी कि वह अपनी मंजिल पा चुकी है। वह अपने बनाए शब्दों द्वारा कृतज्ञता अर्पित करना चाहती है, जिसका मेरे लिए कोर्इ मूल्य नहीं है।

सकारात्मक सोच का आज एक और पाठ

बलरामपुर में मेरे एक परिचित थे जिनका नाम तो मुझे याद नहीं, सभी उन्हें आचार्य जी के नाम से जानते थे। वे बिजली विभाग में कार्यरत थे। साठ वर्ष के होने को थे अर्थात नौकरी से अवकाश ग्रहण करने वाले थे। उन्हें इतिहास की अच्छी जानकारी थी। मेरे बलरामपुर प्रवास के दौरान वे समय मिलते ही मेरे पास आ जाते थे। उन दिनों मेरी बेटी शैली भी मेरे पास रहती थी। जब हम लोग बातों के दौरान इतिहास की गहरार्इ में डूब जाते तो शैली चाय बना कर ले आती थी।

लम्बे समय तक भ्रमण करने के बाद जब मेरा बलरामपुर प्रवास हुआ तो मुझे उनकी याद आर्इ। इतिहास से सम्बनिधत किसी जानकारी हेतु मुझे उनसे मिलना आवश्यक भी था। मैं उनका गाँव तब तक नहीं जानता था। उन्होने अपना जो फोन नम्बर दिया था। उसे मिलाने पर एक ही वाक्य सुनार्इ देता कि उपभोक्ता का नम्बर स्थायी रूप से कट चुका है। मैंने अपनी बेटी शैली से कहा कि मुझे उन आचार्य जी से बहुत जरूरी काम है। फोन मिल नहीं रहा। क्या करूं; शैली ने कहा- अरे पापा! प्राण ध्यान करो। सोच बनाओ और सोच का एस एम एस बना कर सोच के माध्यम से भेज दो। मुझे लगा शैली ठीक कह रही है। करने में  क्या हर्ज है। भले ही शैली ने उस समय वह सब व्यंग्य के रूप में कहा हो लेकिन मंैने कुछ देर प्राण ध्यान किया और उनके प्रति सोच बनाता रहा। तीन दिन व्यतीत हो गए। तीसरे दिन शाम के समय जब किसी ने दरवाजा खटखटाया तो खोलते ही देखा सामने आचार्य जी खड़े थे। मैने उनके पाँव छुए। वे दरवाजे से ही बड़बड़ाते हुए कमरे में दाखिल हुए और कुर्सी पर बैठ गए। वो जो कुछ बड़बड़ा रहे थे, वह इस प्रकार था। मैं बहुत डरते-डरते आया हूँ। आप बलरामपुर में हैं या नहीं? इसका मुझे कुछ पता नहीं था। परसों से मेरे दिमाग में खलबलाहट मची हुर्इ है, कि जाकर बख्शी जी से मिल आऊं। आज तो लग रहा था कि जैसे कोर्इ मुझे भीतर से धकेल कर आपके पास आने को विवश कर रहा है। मैने और शैली ने एक दूसरे की ओर देखा और मुस्करा दिए। अब आचार्य जी को कैसे समझाएं कि उन्हें किस प्रयोग द्वारा बुलवाया गया है। सकारात्मकसोच का आज एक और पाठ पढ़ लिया था।

इच्छा पूर्ति

सुबह के आठ बज रहे थे। मैं अपने स्नानघर हेतु पानी की टंकी लगवा रहा था। उस दिन न जाने क्यों मेरा मन जलेबी खाने को लालायित हो रहा था। अधिकाँशत: मै सुबह का नाश्ता नहीं करता। यदि करता हूँ तो प्रयास रहता है कि दोपहर को न खाया जाए। मेरा जब भी बलरामपुर प्रवास होता है - मेरे भोजन की व्यवस्था मेरे पड़ोसी श्रीवास्तव जी की पत्नी करती हैं। एक पेइंग गेस्ट के नाते, चलने से पूर्व मैं उनका देय अदा कर आता हूँ। नाश्ता शायद कभी कभार ही उनके यहाँ से आता था। भोजन दोनों समय निशिचत समय पर आ जाता था। चाय मैं स्वयं बना लेता था। टी बेग्स वाली नींबू की चाय मुझे अधिक पसन्द है। हाँ! तो मैं पानी की टंकी लगवाने की बात कह रहा था। मिस्त्री टंकी स्थापित करने का काम कर रहा था। अचानक उसने मुझसे कहा-साहब! एक कप चाय पिलवा दीजिए, मै सुबह बिना कुछ खाए पिए आपका काम निपटाने चला आया। मुझे लगा कि शायद ये नहीं जानता कि मैं अकेले रह रहा हूँ। वर्ना यह चाय न माँगता। मैने उसे कुछ पैसे देते हुए कहा कि बाजार जाकर तुम चाय नाश्ता कर लेना और वापसी मे मेरे लिए थोड़ी सी जलेबी और थोड़े से चने या एक समोसा ले आना। वह चला गया। मैने अनुमान लगाया कि वह लगभग बीस-पचीस मिनट बाद आएगा। बीस मिनट बाद मै गैस पर चाय के लिए पानी गर्म करने लगा तभी मैने रसोर्इ में से देखा कि मेरी पड़ोसन मेरी मेज पर एक कटोरी जोकि एक प्लेट से ढकी हुर्इ थी, रख कर चली गर्इं थीं। चाय बनाकर मैं मेज के पास आया। प्लेट हटाकर देखा तो एक बड़ी कटोरी में थोड़ी सी जलेबी और छौंके हुए उबले काले चने थे। उसे देखते ही बरबस मैं मुस्कराने लगा। समझ तो गया यह सोच का परिणाम है। मैने र्इश्वर को धन्यवाद किया साथ ही शिकायत भी की यदि तूने मेरी इच्छा पूरी करनी ही थी, तो व्यर्थ में मेरे पैसे क्यों खर्चाए।
उधर दूसरी ओर वह मिस्त्री नाश्ता करने गया तो दोपहर बाद लौटकर आया और कहने लगा कि- साहब! क्या बतांऊ। वहां दुकान में एक अन्य आदमी मिल गया। वह जबरन अपने साथ ले गया। उसका काम निपटा कर अब फुर्सत पार्इ है। आपकी जलेबी चना लाया है। मैने मुस्कराते हुए कहा मेरी इच्छा पूरी हो चुकी है- तुम इसका भी सेवन कर लो। मैने उससे सच बोला था जबकि मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह मिस्त्री यही सोच रहा होगा कि शायद देरी के कारण मैं नाराज हो गया हूँ, इसलिए नहीं खा रहा।

जब सोच विचारों को साकार होते देखा 1

सोच विचारों को साकार होते देखने की कुछ घटनाएं मुझे याद आ रही हैं।  
मुझे किसी से मिलने के लिए तुलसी पार्क मुहल्ले में जाना था। मैं जिस स्थान पर रहता था वह बहराइच मार्ग पर था। उस मुहल्ले में पहुंचने के दो मार्ग थे। पहला मुख्य सड़क द्वारा वीर विनय चौक होते हुए तथा दूसरा झारखण्डी रेलवे स्टेशन होते हुए। दूरी अधिक न थी। इसलिए मैने पैदल जाने का निर्णय लिया। वह भी स्टेशन होते हुए, क्योंकि वह दूसरे रास्ते की अपेक्षा छोटा था। स्टेशन के निकट पहुंचते पहुंचते मुझे स्टेशन का बाहरी हिस्सा दिखार्इ दिया। वहाँ सड़क पर गन्दा पानी जमा था। मैं किसी भी कीमत पर उस पानी में पाँव रख कर उतना हिस्सा पार करने को तैयार न था। मैं मन ही मन सोच रहा था- हे र्इश्वर! यदि उस पानी तक पहुंचने से पहले कोर्इ रिक्शा वाला अथवा कोर्इ परिचित स्कूटर या कार वाला मिल जाता तो मैं आसानी से गन्दे पानी का वह हिस्सा पार कर लेता। मै सोचता हुआ चला जा रहा था और धीरे-धीरे पानी के निकट पहुंच रहा था। मैने यह भी तय किया कि यदि कोर्इ साधन न मिला तो वापस मुख्य सड़क द्वारा ही तुलसी पार्क जाऊंगा। मै पानी से कुछ ही कदम दूर था कि मेरे निकट एक मोटर साइकिल आकर रुकी और बिना मेरी तरफ देखे उसके चालक ने कहा- भैया बैठो। मैने उसका चेहरा भी नहीं देखा और उसके पीछे बैठ गया। दो मिनट भी नहीं लगे कि उसने मुझे तुलसी पार्क पहुंचा दिया। जहाँ मैने उतरना था वहाँ पहुंचकर मैने उसके कन्धे को थपथपाते हुए कहा- यहीं रोक दो। उसने मोटर साइकिल रोक दी और झुक कर मेरे पाँव छूने लगा तब मैने उसका चेहरा देखा। वह मेरी मुंह बोली बहन प्रीति का भान्जा था। मुझे उसका नाम याद नहीं है। उसके जाने के बाद मैं सोचने लगा- इसका धन्यवाद तो है ही, उससे अधिक धन्यवादी वह है जिसने मेरी सोच को उस तक पहुंचा कर, उसे मेरे पास भेज दिया। यह भी सोच विचार की तरंगों का परिणाम था। 

जिस खिड़की से मैने कड़कती बिजली देखी, वर्षा देखी, चान्दनी देखी थी, अब उसी से सूरज की रोशनी देख रहा हूँ।

एक बार मै गोरखपुर के टूर पर था। उस समय मै उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय वीर बहादुर सिंह की बायोग्राफी लिख रहा था।

गोरखपुर में मेरे एक परिचित पी0 के0 श्रीवास्तव रहते हैं। आज से लगभग 15-20 वर्ष पूर्व हम लोग कस्बे के एक ही मुहल्ले में आमने सामने रहते थे। उनकी पत्नी और मेरी पत्नी में बड़ी घनिष्ठता थी। उनके दोनों बच्चे नेहा और राहुल मेरी पत्नी द्वारा चलाए जा रहे स्कूल में ही पढ़ते थे। एक तरह से हमारे उनसे पारिवारिक घनिष्ठ सम्बन्ध थे। गोरखपुर में उनका निजी मकान था तथा श्रीवास्तव जी मनकापुर में किसी बैंक में प्रबन्धक थे। वे प्रत्येक शनिवार को मनकापुर से गोरखपुर जाते और सोमवार की प्रात: चले जाते। उनसे मिलने की मेरी इच्छा थी। अपने परिचितों के माध्यम से मैने उनका मोबाइल नं0 खोज निकाला। सम्पर्क करने पर पता चला कि वे गोरखपुर में ही है। बल्कि उन्होंने रविवार को घर आने का विशेष आग्रह किया क्योंकि उस दिन उनकी बेटी नेहा का जन्म दिवस था।

पिछले पाँच दिनों से मैं नगर के होटल शिवाय में ठहरा हुआ था। मै बहुत ही सादा भोजन लेने का तथा शहर से कुछ दूर शान्त वातावरण में रहना अधिक पसन्द करता हूँ। मैने शनिवार की शाम को वन मंत्री फतेहपुर बहादुर सिंह के छोटे भार्इ जितेन्द्र बहादुर सिंह को फोन करके अपनी इच्छा से अवगत कराया कि मेरे रहने की व्यवस्था कहीं शान्त वातावरण में कर दें। मेरे क्षेत्र भ्रमण और ठहरने का दायित्व उन पर था। उन्होने बताया कि कल से मेरे ठहरने की व्यवस्था नगर से 10-12 किमी दूर रामगढ़ के वन विभाग के विश्रामालय में कर दी गर्इ है जो कि चारों ओर जंगल से घिरा है। शाम को जितेन्द्र ने कार भेज दी। मैने अपना सामान उसमें रखवा दिया। होटल छोड़कर मैं शान्त वातावरण में रहने के लिए चल दिया।

कार मैं बैठते ही मुझे ध्यान आया कि मुझे पी0 के0 श्रीवास्तव के घर जाना है। अभी नहीं गया तो कठिनार्इ होगी। कार तो मुझे छोड़कर वापस चली आएगी। मैने पी0 के0 को फोन करने के उददेश्य से जेब से मोबाइल फोन निकाला। मोबाइल फोन हाथ में लेते ही अर्थात उनका नम्बर मिलाने के पूर्व ही उधर से पी0 के0का ही फोन आ गया। मैने फोन ड्राइवर को दे दिया ताकि वह आसानी से उनके घर का रास्ता समझ ले। कुछ ही देर में मैं उनके घर पर था। सभी लोग बड़ी आत्मीयता से मिले। वे बार-बार मेरी बेटी का हाल पूछते रहते। नेहा ने शैली का मोबाइल नम्बर नोट किया। नेहा की मम्मी ने जब आग्रह करते हुए शैली से मिलवाने की इच्छा प्रकट की तथा उससे फोन पर बात करवाने को कहा। मैने उनसे बताया कि वह ऋषिकेश में है पता नहीं वापस लौटी है या नहीं। अभी वाक्य पूरा ही किया था कि उधर से शैली का फोन आ गया। घर के प्रत्येक सदस्य ने शैली से बात की। वे सब बातें करने में आनन्द ले रहे थे और मै विचारों की शकित द्वारा उत्पन्न तरंगों पर सोच रहा था। तरंगों की यही भाषा आत्माँए भी समझती हैं। क्षण भर में ही सैकड़ों कि0मी0दूर बैठे व्यकित से बिना मुख से कुछ बोले बिना किसी को देखे, विचारों की भाषा तरंगों के रूप में परिवर्तित होकर भावनाओं का आदान प्रदान कर लेती है। आवश्यकता है इसे और सशक्त करने की।

उसके अगले दिन सामग्री संकलन हेतु मैं दिन भर 'आज अखबार के पुराने अंकों को खंगालता रहा। शाम को लगभग 7 बजे मुझे बन विभाग के रामगढ़ विश्रामालय पहुंचाने के लिए कार आ गर्इ। जब हमारी गाड़ी पक्की सड़क छोड़कर जंगल की कच्ची सड़क पर चलने लगी तो यकायक अांधी आ गर्इ। तेज वर्षा होने के भी आसार नजर आ रहे थे। मुझे ऐसा लगा कि ड्राइवर के मुख के भाव व्यक्त कर रहे थे कि वह भीतर से बहुत परेशान है। मैंने उससे कारण जानना चाहा। ड्राइवर का नाम राधेश्याम सानी था। उसने बताया कि-साहब मीटर बता रहा है कि डीजल समाप्त होने वाला है। तूफान जोरों पर है, किसी भी क्षण कोर्इ वृक्ष गिर सकता है जो हमें नुकसान पहुंचा सकता है। आपको सुरक्षित विश्रामालाय पहुंचाना मेरी प्रथम जिम्मेदारी है। यहाँ मोबाइल नेटवर्क भी नहीं है। मैने उससे कहा- राधेश्याम गाड़ी रोको। उसने गाड़ी रोक दी। गाड़ी रोकने के बाद वह मुझे हैरान सी दृशिट से देखने लगा। मैंने उससे कहा कि अब तुम समझ लो कि तुम्हारी गाड़ी का डीजल समाप्त हो चुका है। अब तुमको क्या करना है, वह सोचो। इतने में गाड़ी की हेडलाइट में मुझे नीलगायों का एक झुण्ड गुजरता दिखार्इ दिया। हम लोग लगभग पाँच मिनट तक उस घने जंगल में रुके रहे। पाँच मिनट बाद ड्राइवर बोला-साहब। शायद इतना डीजल हो कि हम लोग विश्रामालाय तक पहुंच ही जाँए।

ड्राइवर के भय को कम करने के लिए मैंने उसे समझाया-सानी। सबसे पहले तो तुम इस चिन्ता से मुक्त हो जाओ कि मुझे सुरक्षित पहुंचाने का दायित्व तुम्हारा है। तुम मेरे संग हो। तुम्हारी उपसिथति ही मेरा मानसिक बल है। यहाँ अगर कुछ तुम्हें हो गया तो मैं तुम्हारे लिए तत्काल कुछ नहीं कर सकूंगा और मुझे कुछ हो गया तो तुम भी कुछ नहीं कर सकोगे। जब हम एक दूसरे के लिए कुछ कर ही नहीं सकते तो उसके विशय में चिनितत होना व्यर्थ है। तुम गाड़ी स्टार्ट करो और केवल साकारात्मक सोचो कि तुमने मुझे विश्रामालय तक पहुंचाना है। पहुंच गए तो ठीक, वर्ना जितनी दूर तक भी पहुचेंगे,फासला उतना कम ही तो हो जाएगा। बात उसकी समझ आ गर्इ। उसने गाड़ी स्टार्ट की और चल पड़ा। मैंने महसूस किया कि वह पूर्ण रूप से सामान्य है और आत्मविश्वास से भरा हुआ है। वर्षा ने भी गति पकड़ ली थी। लगभग आधे घण्टे के भीतर उसने अपनी गाड़ी विश्रामालय के बरामदे से सटा दी और बोला- साहब! आप दरवाजा खोलकर अपना पाँव सीधे बरामदे में रखिए। उससे आप भीगेंगे नहीं। मैं भीगना नहीं चाहता था अत: वैसा ही किया।

बरामदे में रुक कर मैंने ड्राइवर को भी वहीं बुलवाया और कहा- सानी! तुम चाहो तो यहीं रुक जाओ। सुबह मैं डीजल की व्यवस्था करवा दूंगा, तब चले जाना। उसने झुककर मेरे पाँव छुएं और बोला- साहब! आज मैंने आपसे बहुत कुछ सीखा है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मैं घर पहुंच जाऊंगा। मुझे आज्ञा दीजिए। इतना कहकर वह पलक झपकते ही गाड़ी में जा बैठा। अगले ही क्षण उसकी गाड़ी विश्रामालाय का मुख्य द्वार पार कर चुकी थी।

इस विश्रामालाय में तीन कक्ष थे। आँधी पानी के कारण संभवत: कर्इ वृक्ष अथवा बिजली के खम्बे गिर गए होंगे, इसलिए बिजली नहीं थी। मैं कुछ थकान महसूस कर रहा था। मोबाइल की रोशनी में मैने कपड़े बदले और बिस्तर पर लेट गया।

पानी बरसने की आवाज आ रही थी। जब भी आकाश में बिजली चमकती तो खिड़की और रोशनदान से बिजली की तेज चमक से कुछ क्षणों के लिए पूरा कमरा प्रकाशमय हो उठता। अगले ही क्षण बादलों की गर्जना सिर से पाँव तक भय से कंपा देती।

एक दिन पहले की तो बात थी। मुख्य सड़क से विश्रामालाय के बरामदे के निकट तेज हवाओं से गिर पड़े सूखे पत्ते जब हल्की सी हवा से भी हिलते, तो उनकी आपसी रगड़ से उत्पन्न आवाज एक अजीब सा संगीत पैदा करते थे। और वह मुझे काफी प्रिय लगता। सुबह जब वर्षा की बून्दे ऊँचे-ऊँचे वृक्षों के पत्तों पर गिरतीं पड़तीं भूमि तक पहुंचतीं तो रात की नीरसता को भंग करता गीले पत्तों से उत्पन्न संगीत मन को स्पर्श कर जाता था। मैं पूर्णरूप से प्राकृति की गोद में था। मैं इसका भरपूर आनन्द लेना चाहता था। मैं इस वातावरण का आनन्द बहुत गहरार्इ से उठाने के मूड में था। मैंने अपने सामान को देखा और सोचा कि मेरे पास कीमती अथवा खो जाने के बाद दुखी करने वाला कौन सा सामान है। मैने पाया कि लेपटाप, डिजिटल कैमरा और मोबाइल फोन के अतिरिक्त कुछ ऐसा न था जिसके खो जाने का मुझे दुख होता। इसी मन्थन में व्यस्त था कि चपरासी ने मेज पर खाना लगाने की सूचना देते हुए कहा कि जब तक आप हाथ धोयेंगे तब तक मै जनरेटर चला कर आता हूँ। यह जनरेटर किसी विषेश अतिथि के आने पर ही चलाया जाता था। आज की रात कैसे व्यतीत करनी है, मै इसका निर्णय कर चुका था। जनरेटर चलने का अर्थ था बिजली का आना, और बिजली आने पर मैं लेपटाप पर व्यस्त हो जाता और प्राकृति की गोद में रहते हुए ऐसे आनन्दमयी वातावरण का लुत्फ उठाने से वंचित हो जाता। मैने जनरेटर चलाने से मना कर दिया। टार्च के प्रकाश में खाना खाया। बाहर बरामदे में बाँस से बनी चार कुर्सियाँ व मेज रखे हुए थे। मै एक कुर्सी पर बैठ गया। लगभग एक बजे तक वर्षा का आनन्द लेता रहा। वर्षा बन्द होने पर कमरे में आकर लेट गया। नींद कोसों दूर थी। मैंने अपने को बिल्कुल ढीला छोड़ दिया। चपरासी को बुलाकर अपना सारा सामान उसे किसी अन्य जगह सुरक्षित रखने को दे दिया। कमरे की सभी खिड़की दरवाजे खोलकर लेटे-लेटे खिड़की से बाहर का आनन्द लेता रहा।

वर्षा बन्द हो चुकी थी। कमरे की खिड़की से बाहर फैली चान्दनी में काले-काले वृक्ष दिख रहे थे। कब मैं नींद की आगोश में आ गया, पता ही नहीं चला। और जब आँख खुली तो देखा- रात को जिस खिड़की से मैने कड़कती बिजली देखी, वर्षा देखी, चान्दनी देखी थी, अब उसी से सूरज की रोशनी देख रहा हूँ।

अगली शाम मैं लौटकर विश्रामालाय पहुंचा। कपड़े बदलकर बाहरी बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठ गया। आज कुछ ज्यादा ही थकान लग रही थी। मैं बाँस की कुर्सी पर पलथी मार कर बैठ गया और सिर कुर्सी के पिछले हिस्से से टिका कर विश्राम की मुद्रा में आ गया। कुछ ही मिनट बीते होंगे कि वहाँ का बूढ़ा चौकीदार मेरे पाँव छूते हुए बोला- साहब! साहब! आप आ गए अब हम्मैं शानित मिल गर्इ। इतना कहते हुए वह नीचे फर्श पर मेरे निकट ही बैठ गया। इससे पहले कि मैं उसकी इस हरकत से कुछ समझ पाता तभी वह खुद ही बोलने लगा- साहब तीस बरस से ज्यादा हो गया नौकरी करते। इतने सालों में सैकड़ों अधिकारी लोग यहाँ आए और गए। पर साहब! आज सुबह जब आप चले गए तब से हम भीतर से पता नहीं क्यूं बहुत परेशान रहे। आप जब तक रहे, लगा कि जैसे यहाँ भगवान का वास हो गया है। सारा दिन बहुत बेचैन रहा। साहब! अब आपको देखा तो लगा कि हमार भगवान आ गया। साहब! कलेजा मा बहुत शानित मिली है।

जब उसने बोलना शुरू किया तो मैने पहली बार उसे ध्यान से देखा और उसके भावों को समझने की कोशिश करने लगा। उसकी आयु मेरे विचार से साठ से अधिक थी। मैली सफेद धोती एवं मैला सा कर्इ स्थानों पर से फटा कुर्ता पहने हुए था। उसके चेहरा उसकी गरीबी और विवषता की कहानी स्पष्ट समझा रहा था। साथ ही तात्कालिक प्रसन्नता का भाव भी उसके चेहरे पर दिख रहा था। मेरे पूछने पर उसने बताया कि वह स्थायी कर्मचारी नहीं है। लगभग दो हजार रूपये उसे मानदेय के रूप में मिलते थे वह भी आठ दस महीने बाद जाकर कहीं एक माह का भुगतान प्राप्त कर पाता था। किसी तरह जिन्दगी की गाड़ी को अनितम दिनों तक के लिए खींच रहा था। कुछ देर बाद उसने मुझे खाना खिलाया। खाना खाते हुए मैंने उससे पूछा कि तुम्हारा कुर्ता कितने रूपए में बन सकता है। उसने कहा साहब 30 रूपये के हिसाब से ढार्इ मीटर लगेगा। 75 रूपये लगते हैं। मैंने उसे सौ का नोट देते हुए कहा कि कल तुम एक कुर्ता बनवा लेना। मेरी नर्इ लुंगी जिसे मैंने अभी तक इस्तेमाल नहीं किया था, मेरे पास ही थी। वह भी उसको दे दी। इससे अधिक मैं उसके लिए कुछ करने में असमर्थ था।